Thursday, 21 May 2015

 <><>ख्वाइशें<><> 

ख्वाइशें कुछ ऐसी थी मेरी की क्या बताऊ तुम्हें ,
कुछ पाने की चाह में बहुत कुछ छूट गया ,
खुदको मानते मानते वो हमसे रूठ गया ..
सोचा था एक दिन खुदबखुद सब सही हो जायेगा 
इस रिश्ते को बचाते बचाते हर रिश्ता टूट गया.
न कुछ सही हुआ न कुछ बदला ,,
हम उनके पीछे आर वो हमसे दूर गया ..
आज तक हम पीछे ही है उनके आर वो जाने कहाँ ...
ढूंढ़ता ही फिरता हु यहाँ से वहां ...
<><>सिद्धार्थ <><>

Thursday, 14 May 2015

कुछ शब्द आज के लोगो पर


कितना आसान होता है आजकल लोगो का बदल जाना, बीते पलो की यादों को एक पल में भूल जाना |
कुछ यूँ गुज़रा है वक्त हमारा, ना रात थी हमारी ना दिन था हमारा, जानते है अब मुस्किल है लोट कर जाना |
जिनके सहारे यहाँ तक सफर तय हुआ है, आकर इस मोड़ पर उन्होंने भी ना पहचाना |
कुछ गुस्ताखी हमारी थी तो कुछ गुनाह उनका भी, थोड़ा समय लगेगा पर हो जायेंगे हम भी रवाना |
कितना आसान होता है आजकल लोगो का बदल जाना |

सिद्धार्थ